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रघुवंशम् छंद बद्ध भाव पद्यानुवाद

रघुवंशम् छंद बद्ध भाव पद्यानुवाद
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प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव"विदग्ध" ने किया संस्कृत ग्रँथों का हिन्दी पद्यानुवादभारतीय संस्कृति में आत्म प्रशंसा को शालीनता के विपरीत आचरण माना गया है , यही कारण है कि जहाँ विदेशी लेखकों के आत्म परिचय सहज सुलभ हैं ,वहीं कवि कुल शिरोमणी महाकवि कालिदास जैसे भारतीय मनीषीयों के ग्रँथ तो सुलभ हैं किन्तु इनकी जीवनी दुर्लभ हैं !  महाकवि कालिदास की विश्व प्रसिद्ध कृतियों मेघदूतम् , रघुवंशम् , कुमारसंभवम् , अभिग्यानशाकुन्तलम् आदि ग्रंथों में संस्कृत न जानने वाले पाठको की भी गहन रुचि है ! ऐसे पाठक अनुवाद पढ़कर ही इन महान ग्रंथों को समझने का प्रयत्न करते हैं ! किन्तु अनुवाद की सीमायें होती हैं ! अनुवाद में काव्य का शिल्प सौन्दर्य नष्ट हो जाता है ! ई बुक्स के इस समय में भी प्रकाशित पुस्तकों  को पढ़ने का आनंद अलग ही है !   मण्डला के प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव "विदग्ध" जी ने  महाकवि कालीदास कृत मेघदूतम् ..

Book Details

Pustak Details
Author Chitra Bhushan Shrishtav
ISBN-13 9789382189244
Format Paperback
Language Hindi

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Book Description

प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव"विदग्ध" ने किया संस्कृत ग्रँथों का हिन्दी पद्यानुवाद

भारतीय संस्कृति में आत्म प्रशंसा को शालीनता के विपरीत आचरण माना गया है , यही कारण है कि जहाँ विदेशी लेखकों के आत्म परिचय सहज सुलभ हैं ,वहीं कवि कुल शिरोमणी महाकवि कालिदास जैसे भारतीय मनीषीयों के ग्रँथ तो सुलभ हैं किन्तु इनकी जीवनी दुर्लभ हैं !  महाकवि कालिदास की विश्व प्रसिद्ध कृतियों मेघदूतम् , रघुवंशम् , कुमारसंभवम् , अभिग्यानशाकुन्तलम् आदि ग्रंथों में संस्कृत न जानने वाले पाठको की भी गहन रुचि है ! ऐसे पाठक अनुवाद पढ़कर ही इन महान ग्रंथों को समझने का प्रयत्न करते हैं ! किन्तु अनुवाद की सीमायें होती हैं ! अनुवाद में काव्य का शिल्प सौन्दर्य नष्ट हो जाता है ! ई बुक्स के इस समय में भी प्रकाशित पुस्तकों  को पढ़ने का आनंद अलग ही है !   मण्डला के प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव "विदग्ध" जी ने  महाकवि कालीदास कृत मेघदूतम् के समस्त १२१ मूल संस्कृत श्लोकों का छंद बद्ध भाव पद्यानुवाद कर हिन्दी के पाठको के लिये अद्वितीय कार्य किया है

रघुवंशम् के के सभी १९ सर्गों के लगभग १८०० मूल संस्कृत श्लोकों का  श्लोकशः हिन्दी गेय  छंद बद्ध भाव पद्यानुवाद  हिन्दी के पाठको के लिये  किया है !

प्रो. चित्रभूषण श्रीवास्तव की तन्मयता और अनुवाद कुशलता अद्भुत है। रघुवंश बहुत बडा महाकाव्य है। कालिदास की कृतियो मे एक गहरी दार्शनिकता भी है। जिसे अनुदित करना कठिन कार्य है। रघुवंश का प्रथम पद्य इसका उत्तम उदाहरण है। छोटे छंद अनुष्टुप में किया गया मंगलाचरण का अनुवाद करते हुये प्रो चित्रभूषण श्रीवास्तव ने लिखा है
    जग के माता पिता जो पार्वती शिव नाम
    शब्द अर्थ समएक जो उनको विनत प्रणाम
    इसी भांति महाकवि कालिदास द्वारा दिलीप की गौसेवा का जो सुरम्य वर्णन किया गया है उसका अनुवाद भी दृष्टव्य है।
    व्रत हेतु उस अनुयायी ने आत्म, अनुयायियो को न वनसात लाया
    अपनी सुरक्षा स्वतः कर सके हर मुनज इस तरह से गया है बनाया
    जब बैठती गाय तब बैठ जाते रूकने पे रूकते और चलने पे चलते
    जलपान करती तो जलपान करते यूं छाया सृदश भूप व्यवहार करते।

 


इसी तरह श्रीमद्भगवत्गीता विश्व ग्रंथ के रूप में मान्यता अर्जित कर चुका है , गीता में भगवान कृष्ण के अर्जुन को रणभूमि में दिये गये उपदेश हैं , जिनसे धर्म , जाति से परे प्रत्येक व्यक्ति को जीवन  की चुनौतियो से सामना करने की प्रेरणा मिलती है . परमात्मा को समझने का अवसर मिलता है . जीवन मैनेजमेंट की शिक्षा गीता से मिलती है .नयी पीढ़ी संस्कृत नही पढ़ रही है , और ये सारे विश्व ग्रंथ मूल संस्कृत काव्य में हैं , अतः ऐसे महान दिशा दर्शक ग्रंथो के रसामृत से आज की पीढ़ी वंचित है .
 प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ने इन रचनाओ का श्लोकशः हिन्दी भाव पद्यानुवाद का महान कार्य करके  काव्य की उसी मूल भावना तथा सौंदर्य के आनंद के साथ हमारे सांस्कृतिक ज्ञान ,साहित्य को हिन्दी जानने वाले पाठको के लिये सुलभ करा दिया है . यह कार्य 90 वर्षीय प्रो. श्रीवास्तव के सुदीर्घ संस्कृत , हिन्दी तथा काव्यगत अनुभव व ज्ञान से ही संभव हो पाया है . यद्यपि प्रो श्रीवास्तव इसे ईश्वरीय प्रेरणा , व कृपा बताते हैं .


 जन हित में इन अप्रतिम अनुदित कृतियों को आम आदमी के लिये संस्कृत में रुचि पैदा करने हेतु इन पुस्तकों को इलेक्र्टानिक माध्यमों से प्रस्तुत किया जाना चाहिये .
यह कृति पुस्तक के रूप में भी प्रकाशित है , जो सीधे लेखक से प्राप्त की जा सकती है .


प्रो सी बी श्रीवास्तव , ओ बी ११ , विद्युत मण्डल कालोनी रामपुर , जबलपुर ४८२००८

मो ९४२५८०६२५२

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