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आक्रोश , समकालीन नई कविता

आक्रोश , समकालीन नई कविता
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आक्रोश , समकालीन नई कविता
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आक्रोशयुवाओ के आक्रोश भरे स्वर समाज को जीवंत बनाये रखने के लिये आवश्यक होते हैं . इस पुस्तक में छोटी छोटी नई कवितायें संग्रहित हैं , सहज सरल प्रतीको के माध्यम से इस संग्रह की हर कविता एक शब्द चित्र बनाती है , और समाज की विसंगतियो को रेखांकित करती है . कविता के अंत में समस्या का समाधान भी कवि ने बताया है . पुस्तक पठनीय है . जो विचारो को झंकृत करती है . और नये तरीके से सोचने पर विवश करती है . ऐसे अनेक दृश्य जिनहें हम देखकर भी अनदेखा कर देते हैं इन कविताओ के माध्यम से कवि ने हमें दिखलाने का सफल प्रयास किया है .जानता हूँ मैं कि तुम्हें ,अच्छा नहीं लगतामेरा लिखना खरा खरामाना कि क्रांति नहीं होगीमेरे लिखने भर सेपर मेरे न लिखने सेयथार्थसुनहले सपनों सा सुंदरतो नहीं हो जायेगा ?सपनों को बनाने के लिये यथार्थविवशता हैअभिव्यक्ति आक्रोश की !......................आक्रोश से अंश ..

Book Details

Pustak Details
AuthorVivek Ranjan Shrivastav
FormatPaperback
LanguageHindi

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Book Description

आक्रोश

युवाओ के आक्रोश भरे स्वर समाज को जीवंत बनाये रखने के लिये आवश्यक होते हैं . इस पुस्तक में छोटी छोटी नई कवितायें संग्रहित हैं , सहज सरल प्रतीको के माध्यम से इस संग्रह की हर कविता एक शब्द चित्र बनाती है , और समाज की विसंगतियो को रेखांकित करती है . कविता के अंत में समस्या का समाधान भी कवि ने बताया है . पुस्तक पठनीय है . जो विचारो को झंकृत करती है . और नये तरीके से सोचने पर विवश करती है . ऐसे अनेक दृश्य जिनहें हम देखकर भी अनदेखा कर देते हैं इन कविताओ के माध्यम से कवि ने हमें दिखलाने का सफल प्रयास किया है .
जानता हूँ मैं कि तुम्हें ,
अच्छा नहीं लगता
मेरा लिखना खरा खरा
माना कि क्रांति नहीं होगी
मेरे लिखने भर से
पर मेरे न लिखने से
यथार्थ
सुनहले सपनों सा सुंदर
तो नहीं हो जायेगा ?
सपनों को बनाने के लिये यथार्थ
विवशता है
अभिव्यक्ति आक्रोश की !
......................आक्रोश से अंश

 

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