Hello Reader
Books in your Cart

मैं साक्षी यह धरती की

मैं साक्षी यह धरती की
-25 %
मैं साक्षी यह धरती की
Shorten the URL
Shorten the book link using GetPustak
Product Views: 2056
₹68
₹90
Reward Points: 280
सप्तश्रृंगी गिरिराज हिमालय का जन्म से लेकर मानसरोवर की अगाध गहराई तक, शिवजी के प्रथम सोपान से लेकर आज तक हर सूक्ष्म से सूक्ष्म पहलू मुझसे छुपा नहीं है। जब चाँद अपनी सखियों के संग आकाश में उभर आता है उन सितारों में मैं अपनी पृष्ठभूमि के सौंदर्य को निहारती आई हूँ। उन सितारों में एक सपनों का महल खड़ा देखा है मैंने। शायद उसी को त्रिशंकु कहा जाता है। विश्वामित्र और मेनका के प्यार की नगरी। उस नगर की रचना भी मैंने ही लाखों साल पहले की थी। उनके प्यार की दास्ताँ आज भी मेरे मन के किसी कोने में दफ़न हो कर रह गयी है।रावण ने जब सीता का अपहरण किया था, तब पंक्षीराज जटायु ने उनके बचाव में मेरी गोद में शेष साँस छोड़ी थी। सीता मैया को बचाते-बचाते कितने ही दिये मेरे आँखों के सामने बुझ गए, ये मेरे अलावा कौन जान सकता है? हज़ारों वानरों की सहायता से बना उस सेतु के निर्माण की साक्षी भी मैं ही हूँ। निर्माण में मेरा भ..

Book Details

Pustak Details
AuthorBook

Reviews

Write a review

Note: HTML is not translated!
Bad Good
Captcha

Book Description

सप्तश्रृंगी गिरिराज हिमालय का जन्म से लेकर मानसरोवर की अगाध गहराई तक, शिवजी के प्रथम सोपान से लेकर आज तक हर सूक्ष्म से सूक्ष्म पहलू मुझसे छुपा नहीं है। जब चाँद अपनी सखियों के संग आकाश में उभर आता है उन सितारों में मैं अपनी पृष्ठभूमि के सौंदर्य को निहारती आई हूँ। उन सितारों में एक सपनों का महल खड़ा देखा है मैंने। शायद उसी को त्रिशंकु कहा जाता है। विश्वामित्र और मेनका के प्यार की नगरी। उस नगर की रचना भी मैंने ही लाखों साल पहले की थी। उनके प्यार की दास्ताँ आज भी मेरे मन के किसी कोने में दफ़न हो कर रह गयी है।

रावण ने जब सीता का अपहरण किया था, तब पंक्षीराज जटायु ने उनके बचाव में मेरी गोद में शेष साँस छोड़ी थी। सीता मैया को बचाते-बचाते कितने ही दिये मेरे आँखों के सामने बुझ गए, ये मेरे अलावा कौन जान सकता है? हज़ारों वानरों की सहायता से बना उस सेतु के निर्माण की साक्षी भी मैं ही हूँ। निर्माण में मेरा भी योगदान है। उस वक्त वानरों के उत्साह में मैं भी शामिल थी। पहली बार जब राम जी के पग ने मेरे शरीर को स्पर्श किया था तब समुन्दर में कम्पन हुआ था, शायद उसी कम्पन से आज तक सागर में विशाल लहरें उठती आयीं हैं।

मैं उस दिन की भी साक्षी हूँ, जब राम जी ने सीता मैया का उद्धार किया था। रावण की कैद से मुक्त कर उनकी अग्नि परीक्षा ली गयी थी। मेरा कण कण चिल्ला चिल्ला कर कह रहा था कि यह अन्याय है। सीता मैया पर यह शंका...? मगर मैं सिर्फ देखती रह गयी, क्योंकि सीता मैया ने मुझे कुछ न बोलने कि कसम जो दे रखी थी। धिक्कार है मुझे…, चुपचाप देखने के अलावा कुछ न कर पाई थी मैं।

तब से लेकर आज तक हर पल हर क्षण स्त्री, अग्नि परीक्षा देती आई है। मेरी ही आँखों के सामने न जाने कितनी अबला नारियां देखते-देखते सागर में एकाकार हो चुकी हैं और कितनी ही मेरी बालुका पर इज्जत गंवा चुकी है। यह सिर्फ मैं ही जानती हूँ, फिर भी मैं चुप हूँ। कभी मुझे दुःख होता है की काश मैं, मैं नहीं होती और इन सबका ज्ञान मुझे न होता। मैं सिर्फ पाषाण बन कर रह गई होती। मगर मैं बालुका हूँ, युगों युगों से मैने  हजारों दुःख देखे हैं। उन्हें देखते हुए मेरे मन ने कभी एक सच्चे युग की कामना की थी।

स्त्री, दुर्गा है और काली भी, धरती जैसी सहनशील भी। जन्म से लेकर मृत्यु तक हर पल कभी बेटी बन कर, कभी बहन, कभी बीवी और कभी माँ बन कर सिर्फ सेवा करती आई है। फिर भी उस की हर पल अपमान हुआ है। बेबस यह भू-माता ज्वालामुखी को अपने अंदर समेट कर सहती आई है। भूमि के तल तक पहुँच कर मैंने जब देखा उस गहराई में आंसू और खून के अलावा मुझे कुछ भी दिखाई नहीं दिया।

इस तरह धरती माता बार-बार चोट खाकर मूक बन खड़ी है। अगर दिल से उसकी आह निकलती है तो जिम्मेदार कौन है? बर्फ की चट्टान पिघल कर बूंद-बूंद कर जल राशि का रूप धारण कर सागर की गहराई बढ़ाने लगे तो किस कारण? अनादि काल से चलती आ रही संस्कृति, परंपरा सब किसके लिए है? इसीलिए न कि मानव जाति का कल्याण हो। आधुनिक परी-करण के विस्तार से लोग साज सज्जा के शौकीन हो कर पेड़-पौधे काटते जा रहे है। रोज़मर्रा की जिंदगी में जरूरत की चीज़ें लोगों के जरूरत के साथ बढ़ती जा रही हैं। कहाँ है इसका अंत? कहीं तो रोकना है। मगर कहाँ और कौन रोकेगा?

समग्र जीव जंतु की ज़िंदगी आज खतरे में है। जन-जीवन के साथ-साथ मैं भी बेहाल जिंदगी गुजार रही हूँ। आग सुलग रही है, बुझाएगा कौन? न जाने कितनी जिंदगी इस आग के लपेटे में आ जाएंगी।

सहज, सरल जीवन कठिन से बदतर होता जा रहा है। पेड़, पौधे, जानवर, जन जीवन भी खतरे में है। रोग नए न जाने कितने ही लोगों की जान ले रहे हैं। सँभालना है, मानव को संभलना है। काश, मानव पहले ही समझ पाता। अब बहुत देर हो चुकी है। समुद्र की लहरें भूमि को निगलती जा रही हैं। मौसम हर साल नया रूप दिखा रहा है। सूरज की रश्मि पर भी काली घटाएँ छा रही हैं। एक दिन था, जब हवा में सुगंध थी, एक दिन था जब पानी की मिठास से जिंदगी जी उठती थी। एक दिन था, सूरज की पहली किरण जीवन में नए आशाएँ भर देती थी।

मगर आज डर ...

Latest Books on PustakMandi

Seller Featured Products

Raise your Query?
Let's help